फ़िदा हुसैन के राधा की पेंटिंग सी

लरजती साँसों में
सहवास की कहाँ मिठास होती है
अब तो तेरे ढलके बदन पर
अक्सर मेरा रोमांस रोता है
कसक अब कहाँ तुममें
फ़िदा हुसैन के राधा की पेंटिंग सी
जो बजते थे
पायल लिपटकर एक होने में
वो अब तेरे पैरों को अक्सर छील जाते हैं,
चूड़ियाँ अब कहाँ
खनकती हुई अच्छी लगती हैं
होंठों को अब तेरे कहां
वो साज छूकर मचलते हैं;
क़रीब होने पर अब कहां
कलेजा धक् से कहता है
अब कितना भी कुछ कहती हो
वो चुप सा रहता है
खैर मै भी अब उतना जवां नहीं
नहीं हूँ साथ तो क्या
फिर भी कब्र पर लगे पत्थरों
में उम्र अपनी झाँक लेता हूँ…
(From : Aye Zindagi Tu Ret To Nahi)

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