बाग़ की तासीर

बाग़ की तासीर

निकले कहीं
जां तो बेसाँस को कन्धा दे देना
उजड़े बाग़ की तासीर कहीं रास न आई तो
मुकम्मल ज़िंदगी की
दास्तानगोई की क्या माने
कुछ मिले तो जैसे
फिसले चश्मे पर आंसू से
उन्हें रोक गर पाते तो तकलीफ़ों के घर बनते
हम तो राहगीर थे बस कुछ लम्हों के
पापा कैसे कहूँगा
की घर छूता तेरा तो
मेरी तबस्सुम रूठकर रोएगी …
न कोई कविता लिखी जाएगी
और न कठपुतलिया मंच पर रक्स करेंगी,
कहानी होगी पर उसके रस्ते सूने पड़े होंगे
कलम काग़ज़ तो होंगे
पर उनमें प्रेम न होंगे …क्योंकि हम कहीं वीरान में होंगे…
… निकले कहीं
जां तो बेसाँस को कन्धा दे देना
उजड़े बाग़ की तासीर कहीं रास न आई तो…

(From: Aye Zindagi Tu Ret To Nahi)
ध्रुव हर्ष

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